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सबसे बड़ा उपहार

  • आचार्य नीरज शास्त्री
  • 16 सित॰ 2020
  • 1 मिनट पठन

अपडेट करने की तारीख: 25 सित॰ 2020

जीवन के आठवें साल में

प्रवेश करने पर

बच्चे को गोद में उठाया मां ने।

और कहा - "मेरे लाल!

तुझे देने के लिए इस वक्त

मेरे पास कुछ भी नहीं रहा

परंतु

आज मैं तुझे दे रही हूं वही

जो लव कुश को दिया मां सीता ने

और पार्थ को गीता ने।

जिसे कहते हैं जीवन-मूल्य।

यही होगा उपहार

तेरे लिए अमृत तुल्य।

कभी किसी निर्दोष पर

मत करना अत्याचार।

वर्षाना सभी पर करुणा

और करना सद्व्यवहार।

दुनिया में सबसे अमूल्य हैं शुभाशीष,

शुभकामना और प्यार।

किसी निर्दोष, कर्मनिष्ठ के रास्ते

में कभी मत बनना दीवार ।

ताउम्र निभाना रिश्ते

और

समाज देश तथा जगत के प्रति कर्तव्य।

तभी जीवन बनेगा भव्य।

मत भूलना

अंतिम विजयी होता है सत्य ।

इसे उतार लेना हृदय पटल पर

और रखना

सुंदर पारदर्शी चरित्र।

करना सभी के साथ न्याय,

करना हिंसा का प्रतिकार।

मैं जो दे रही हूं

आदर्शों की शिक्षा।"

बेटे ने कहा - "मां यही तो है

सबसे बड़ा उपहार।

संभाल कर रखूंगा इसे

विरासत की तरह।

इस शिक्षा से

जीवन को उन्नत बनाऊंगा।

तथा लव, कुश, ध्रुव और प्रहलाद का

उदाहरण बन जाऊंगा।।

 

आचार्य नीरज शास्त्री

34/2, लाजपत नगर, एन. एच-2, मथुरा281004

संपर्क सूत्र- 9259146669

shivdutta121@gmail.com

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